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उम्र के अनुसार सोच बदलने से मिलती हैं खुशी


उम्र के अनुसार सोच बदलने से मिलती हैं खुशी

Umr ke anusar soch badlane se milti hai khushi

जब इंसान 50 साल की उम्र पार करता है तो उसको अगर खुशहाल रहना है तो अपने लाइफ स्टाइल में परिवर्तन जरूर लाना चाहिए तब वह खुद भी सुखी रहेगा और दूसरो के जीवन में खुशहाली ला सकता है मैंने इसका अनुभव किया है शेयर करते है एक दोस्त के माध्यम से मैंने अपने एक मित्र से पूछा जो 50 पार कर चुका है और 60 की ओर जा रहा है कि वह अपने जीवन में किस तरह का बदलाव महसूस कर रहा है ? उसने निम्नलिखित बहुत दिलचस्प पंक्तियाँ भेजा हैं जिन्हें मैं आप सभी के साथ साँझा करना चाहूंगा। मेरे माता-पिता मेरे भाई-बहनों, मेरी पत्नी मेरे बच्चों मेरे दोस्तों से प्यार करने के बाद अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूँ। मुझे अब एहसास हो गया है कि मैं "एटलस" नहीं हूँ। दुनिया मेरे कंधों पर नहीं टिकी है। मैंने अब सब्जियों और फलों के विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी बंद कर दी है। 

हमेशा सकारात्मक सोचे । Always be positive things.

आखिरकार कुछ रुपए अधिक देने से मेरी जेब में कोई छेद नहीं होगा लेकिन इससे इस गरीब को अपनी बेटी की स्कूल फीस बचाने में मदद मिल सकती है। मैं बचा चिल्लर का इंतजार किए बिना टैक्सी चालक को भुगतान करता हूँ। अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक मुस्कान ला सकता है। आखिर वह मेरे मुकाबले जीने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है। मैंने बुजुर्गों को यह बताना बंद कर दिया कि वे पहले ही कई बार उस कहानी को सुना चुके हैं। आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें ताज़ा करती है और जिंदगी जीने का हौंसला बढ़ाती है। कोई इंसान अगर गलत भी हो तो मैंने उसको सुधारना बंद कर दिया है। 


आखिर सबको परफेक्ट बनाने का दायित्व मुझ पर नहीं है। ऐसे परफेक्शन से शांति अधिक कीमती है। मैं अब सबकी तारीफ बड़ी उदारता से करता हूं यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की मनोदशा को उल्लासित करता है, बल्कि यह मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है! अब मैंने अपनी शर्ट पर क्रीज या स्पॉट के बारे में सोचना और परेशान होना बंद कर दिया है। मेरा अब मानना है कि दिखावे की अपेक्षा व्यक्तित्व ज्यादा मालूम पड़ता है। मैं उन लोगों से दूर ही रहता हूँ जो मुझे महत्व नहीं देते। आखिरकार वे मेरी कीमत नहीं जान सकते लेकिन मैं वह बखूबी जानता हूं । मैं अपनी भावनाओं से शर्मिंदा ना होना सीख रहा हूँ आखिरकार यह मेरी भावनाएँ ही हैं जो मुझे मानव बनाती हैं।

रिश्तो को तोड़ने के बजाय अहंकार का त्याग करें

मैंने सीखा है कि किसी रिश्ते को तोड़ने की तुलना में अहंकार को छोड़ना बेहतर है आखिरकार मेरा अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा जबकि रिश्तों के साथ मैं कभी अकेला नहीं रहूंगा।मैंने प्रत्येक दिन ऐसे जीना सीख लिया है जैसे कि यह आखिरी हो। क्या पता आज का दिन आखिरी हो। सबसे महत्वपूर्ण मैं वही काम करता हूँ जो मुझे खुश करता है। आखिरकार मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूँ और मैं अपनी खुशी की हक़दार भी हूं। इसीलिए खुशी के लिए दूसरो पर निर्भर नहीं हूं। सच मे अगर कुछ परिवर्तन करे उम्र के अनुसार सब कुछ ठीक हो जाएगा। 

 विकास मिश्र 
 श्री वेंकटेश्वर कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय
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