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Bhakti yoga kya hai | भक्ति योग का अर्थ, महत्व एवं प्रकार

Bhakti yoga kya hai | भक्ति योग का अर्थ, महत्व एवं प्रकार 


Bhakti yoga kya hai.


Bhakti yoga kya hai in hindi. भारतीय संस्कृति में योग का बहुत महत्व है । योग विद्या हमारे ऋषि मुनियों की देन है । योग हमारे जीवन में सार्थकता प्रदान करते है । निरोग रखने के साथ आध्यात्मिक रूप से आत्मा एवं परमात्मा के मिलन का प्रमुख माध्यम है । योग 4 प्रकार के होते है । राज योग, कर्म योग, ज्ञान योग एवं भक्ति योग आदि । अध्यात्मिक दृष्टि से भक्ति योग बहुत महत्वपूर्ण है । bhakti yoga से साधक भौतिकवाद को छोड़कर आध्यात्मिक उन्नति करता है ।

जब हम भौतिक चेतना से मुक्त होते हैं और आध्यात्मिक जागरूकता की ओर बढ़ते हैं, और उस स्तर पर काम करते हैं, तो हम अपने शरीर और आत्मा के साथ क्या करते हैं, इसमें कोई अंतर नहीं है। सब कुछ भक्ति-योग में लगा हुआ है, आध्यात्मिक प्राप्ति की प्रक्रिया और सर्वोच्च भगवान के लिए हमारी भक्ति सेवा करने की प्रक्रिया। यह तब भी होता है जब मन का सूक्ष्म शरीर, बुद्धि और मिथ्या अहंकार, हम कौन हैं की झूठी धारणा और हमारी कामुक इच्छाओं का भंडार हमारे आध्यात्मिक विकास से वाष्पित हो जाते हैं।

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भक्ति योग क्या है ? bhakti yoga kya hai in hindi.

Bhakti ka arth. भक्ति का अर्थ है, भजन, अर्थात् अपने इष्टदेव की मन वचन कर्म से उपासना करना ही भक्ति है।  भक्ति को प्रसंगानुसार तथा व्यक्ति विशेषानुसार परिभाषित किया जाता है। जैसे : गुरू भक्ति, मातृ-पितृ भक्ति, देश भक्ति इत्यादि। सभी प्रसंगों में भक्ति मानसिक व शारीरिक रूप से समर्पण ही है। भक्ति की श्रेष्ठता इसी में है कि साधक मन में प्रेम धारण कर भक्ति में डूब जाए। केवल सेवा भाव भक्ति नहीं कहलाता, जबतक कि उसमें श्रद्धा व प्रेम भाव शामिल न हो।


गीता के अनुसार भक्ति योग का महत्व - Bhakti yoga ka mahatwa.

 गीता के लगभग सभी अध्यायों में श्री कृष्ण ने सगुण परमेश्वर की उपासना पर बल दिया है। उनके अनुसार सामान्य मनुष्यों के लिए सगुण की उपासना करने आसान एवं उत्तम है। क्योंकि जीवित मनुष्य के लिए परमात्मा के स्वरूप में ध्यान लगाना आसान होता है। यह एक प्रकार से रागानुगा भक्ति अर्थात् अपरा भक्ति योग का अनुमोदन है। श्री कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि उनको पाने का सरल मार्ग प्रेम है। इससे साधक का मन से जुड़ाव होता है क्योंकि वह परमात्मा के किसी न किसी रूप को सामने रख कर ध्यान लगाता है। निर्गुण रूप की उपासना सरल नहीं है। 

श्री कृष्ण के अनुसार केवल योगी ही परमात्मा के निर्गुण स्वरूप में ध्यान लगा सकते हैं। क्योंकि उनके लिए शरीर व उससे जुड़ी क्रियाएँ नगण्य हो जाती हैं। निरंतर अभ्यास से वह भौतिक जगत से अलग हो कर प्रमत्न के सच्चिदानंद स्वरूप के प्रति आसक्त होते हैं। परंतु यह कठिन मार्ग है जिस पर चलना हर किसी के लिए संभव नहीं है। हालांकि श्री कृष्ण गीता में Bhakti yoga के अपरा व परा दोनों रूपों के महत्व को समान रूप से व्याख्यायित करते हैं।

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो सभी व्यक्तियों के भीतर मेरी उपस्थिति का निरंतर ध्यान करता है, उसके लिए मिथ्या अहंकार के साथ-साथ प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या और अपमान की बुरी प्रवृत्ति बहुत जल्दी नष्ट हो जाती है। एक अन्य श्लोक इंगित करता है कि स्वयं को ईश्वर में लीन करके, हम अपने भीतर या अपने आस-पास होने वाले भौतिक परिवर्तनों से परे रह सकते हैं। 


भक्ति योग के भेद - Type of bhakti yoga -

भक्ति नौ प्रकार की मानी जाती है। जिसमें दास्य, सख्य, स्मरण इत्यादि रूप हैं। परन्तु भक्ति योग ( Bhakti yoga ) के दो भेद स्वीकार किए जाते हैं- अपरा व परा भक्ति । 

  • परा भक्ति - यह भक्ति ज्ञान की उत्तमावस्था है। गीता के अनुसार परा भक्ति तत्व ज्ञान की पराकाष्ठा है, जिसमें मुक्ति को छोड़ कर कोई इच्छा शेष नहीं रहती।
  • अपरा भक्ति - यह भक्ति ईश्वर के प्रति भावपूर्ण प्रेम भाव से समर्पित होने का नाम है। जिसमें साधक परमात्मा की प्रसन्नता के हित कार्य करता है। इसमें प्रेम अथवा राग की प्रधानता होती है। इसके भी तो भेद हैं- वैधी तथा रागानुगा।


भक्ति योग के फायदे - Bhakti yoga ke fayde -

Bhakti yoga. भौतिक दृष्टि से योग का अर्थ कितना भी शारीरिक स्तर तक समझाया जाए तो भी योग अपने सूक्ष्म और समग्र अर्थ में आध्यात्मिक व आत्मिक प्रक्रिया है, जो हमारी व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना से जोड़ती है।

योग हमारे शारीरिक और मानसिक असंतुलन को नियंत्रित करने तथा तनाव जैसी मानसिक परेशानियों से मुकाबला की शक्ति प्रदान करता है। इसके साथ ही शरीर, मन व आत्मा को सद्भावपूर्ण एकीकृत स्तर पर ला कर बौद्धिक उन्नति में सहायता करता है। भक्ति योग इससे आगे की स्थिति है। 


  • निष्काम भाव - Bhakti yoga हमें परमात्मा को समझने तथा स्वार्थ भाव से ऊपर उठ कर निष्काम भाव से ईश्वर तथा संसार को समझने की दृष्टि प्रदान करता है।
  • अंहकार का त्याग - Bhakti yoga हमे अंहकार भाव को त्याग कर निस्वार्थ भाव से कर्म करने के लिए प्रेरित करता है । जिसमे ईष्या एवं लोभ का कोई स्थान नहीं है ।
  • भौतिकवाद से मुक्ति - भक्ति योग में भौतिकवाद का कोई स्थान नहीं है । सरल सादा जीवन व्यतीत करते है । 
  • परहित पर बल - भक्ति योग हमेशा मानव कल्याण की ओर अग्रसर है । दूसरों के सुख में स्वयं की खुशी तलाशते है । 
  • ईश्वरीय ज्ञान - Bhakti yoga में साधक ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति करता है जिसे समस्त कष्टों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर बढ़ता है ।

Bhakti yoga ke fayde.


भक्ति योग कैसे करें | Bhakti yoga kaise kare -

 भक्ति योग कोई प्रक्रिया या पद्धति नहीं है। यह वह नहीं है जो हम करते हैं। यह तो वह है जो वास्तव में हम हैं। वास्तविक चेतना का बोथ और परम चेतना का अनुभव और उसके प्रति निस्वार्थ समर्पण ही भक्ति योग है। स्वयं की दैहिक और भौतिक पहचान के परे, उस सर्वव्यापी सत्य से साक्षात्कार ही भक्ति योग है। स्वयं से ऊपर उठ कर परम् सत्ता का अनुभव ही ज्ञान है। जो भक्ति से प्राप्त होता है।


भक्ति योग से समाधि की सिद्धि होती है - 

जहां ज्ञान व कर्म योग परमात्मा प्राप्ति के कठिन व रुक्ष मार्ग हैं वहीं भक्ति योग ईश्वर को पाने का सरस व प्रेममयी मार्ग है। अपने इष्ट के प्रति अनन्य अनुराग, निःस्वार्थ सेवा भाव, अनन्त श्रद्धा व सरलता भक्ति योग के उत्तम आदर्श हैं। इन्हीं की बिना शर्त साधना सामान्य साधक को समाधि की गुह्य वीथियों तक ले जाती है।

 अपरा भक्ति किसी सद्गुरू की छत्र छाया में विस्तार पाती है। इस अवस्था में साधक अपने भीतर के तम और रज को धोने की प्रक्रिया से गुजरता है। इसके बाद ही वह परा भक्ति अर्थात् ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करता है।यह श्रेष्ठतम स्थिति है जो निरंतर सेवा भाव से विस्तार व गहराई पाती है। अगर इसे सगुन और निर्गुण में बांटें तो सगुन के प्रति अनुराग श्रद्धा समर्पण ही साधक को शुद्ध चेतन स्वरूप निर्गुण ब्रह्म तक ले जाने में सहायक होते हैं। यही भक्ति योग ( Bhakti yoga ) में समाधि की अवस्था है।


FAQ

Q1. गीता के अध्याय 12 भक्ति योग का सार क्या है ?
Ans - परमात्मा को पाने का सरल मार्ग सगुण भक्ति है। 

Q2. श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार योग की परिभाषा क्या है ?
Ans - योग परमात्मा को पाने का मार्ग है । ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग तीनों ही ईश्वर प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

Q3. भगवान के निराकार स्वरूप में आसक्त व्यक्ति क्या प्राप्त करता है ?
Ans - यह एक कठिन मार्ग है जिस में स्थित होना सब के सम्भव नहीं परन्तु इस पथ के साधक परमात्मा को प्राप्त करते हैं।

Q4. भक्ति भाव क्या है ?
Ans.- परम तत्व के प्रति अनन्य प्रेम व श्रद्धा ही भक्ति है।

Q5. गीता के अनुसार भक्ति योग क्या है ?
Ans - गीता भक्ति योग को परमात्मा प्राप्ति का उत्तम साधन बताती है।

Q6. भक्ति का मूल क्या है ?
Ans - भक्ति का मूल अर्थ निस्वार्थ सेवा करना, भजना है । यानी निस्वार्थ भाव से, श्रद्धा से अपने इष्टदेव के प्रति अटूट विश्वास एवं आस्था । नारदभक्तिसूत्र में भक्ति का अर्थ अमृतरूप एवं प्रेम रूप बताया गया है । जिसे प्राप्त कर मनुष्य अमरता को प्राप्त करता है ।

Q7. प्रेमा भक्ति का क्या अर्थ है ?
Ans - भौतिक रूप से मनुष्य को जितना गहरा लगाव होता है जैसे गाड़ी, बंगला या पत्नी । उसी रूप में उतना ही लगाव अपने इष्ट देव से होता है उसे प्रेमा भक्ति कहा गया है । यानी ईश्वर के प्रति जो अटूट विश्वास एवं प्रेम होता है वही प्रेमा भक्ति है ।

Q8. भक्ति के लक्षण क्या है ?
Ans - भक्ति मोक्ष का मार्ग होता है जो दूसरों को बिना प्रकार का कोई संताप, पीड़ा या कष्ट पहुँचाए बिना शुद्ध अन्तःकरण से व्यवहार करना चाहिए । वास्तव में वही सच्चा भक्त है जो परहित में अपना सुख तलाशता है ।

Q9. भक्ति की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं ?
Ans - भक्ति की प्रमुख विशेषताओं के गुरु की महिमा एवं प्रधानता, काम, क्रोध, लोभ, अहम एवं मोह - माया का त्यागकर प्रेम भाव से भक्ति करना । भजन कीर्तन करके जनमानस में ईश का वर्णन करना ।

Q10. वास्तव में सच्ची भक्ति क्या है ?
Ans - निस्वार्थ भाव से, परहित से, प्रेम से, दृढ़ संकल्प से किया गया ईश प्रेम ही सच्ची भक्ति है ।


Q11. भक्ति क्यों की जाती है ?
Ans -  आत्मा - परमात्मा के मिलन या सभी कष्टों की मुक्ति के, मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति की जाती है ।


उम्मीद करते है मित्रों आज का टॉपिक Bhakti yoga kya hai आपको पसंद आया होगा । आप अपने विचार हमारे कमेंट Box में लिखे ।। Dr. Priya sufi ।।


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